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         जली रहना कंदीलों

१
अनजान कुहरों के पार
मन की राहें
जब विवश हो जायँ
छीन लें कोई जागती उम्मीदें
इस चौखट, उस ताखे पर
तन्हा बरगद के तले
जली रहना कंदीलों

२
ज़ब आहत हो मन
कुहासा कंबल ओढ़े बैठा हो
पगडण्डी निद्रा में हो लीन
दृश्य धुँधले हो जाएँ
तब तुम
रौशन कंदीलों में
स्वर्णिम पंख लगा जाना

३
साँझ ढले
अटरियों पर टँगी सुलग सुलग
कितना आलोक बिखराती हो
भटक गए पथिकों को
सन्मार्ग दिखाती हो
यों कंदील कहलाती हो
४
अंधकार गहन हुआ
पाँव धँसी कील
दूर अटरिया पर
फिर जाग उठी कंदील

५
ये ज़िद हमारी हैँ
इसी इरादे पर
दुनिया की जंग जारी हैँ
कंदीलों को बचाना ही तो
समुद्र की जिम्मेदारी हैँ
एक छोटी सी कंदील भी
बड़े तूफान पर भारी है

- मंजुल भटनागर

१ नवंबर २०२१

     

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