अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

         1छोटा दीपक

लम्बा पथ छोटा दीपक था
बड़ा हौसला, नन्हे हाथ
ले प्रकाश का वर्तुल चलता
डरी भयानक, काली रात

जब तक नही जला था दीपक
था माटी, बाती और तेल
भ्रम था एक अँधेरा गहरा
ये तो था बस, मन का खेल

जला दीप और हुई प्रकाशित
दशों दिशाएँ, हुआ उजास

ईर्ष्या, द्वेष, कपट, लालच का
खेल उम्र भर चलता है
भ्रम का जीवन, भ्रम ही जीवन
भ्रम ही जीवन लगता है

आगे का जीवन अनबूझा
दिन मे भी हो, जैसे रात

हार नही मानी तो
रस्ता कैसे भी कट जाता है
चार कदम भी दिखे तो राही
मंजिल तक हो आता है

ज्ञान का दीपक जल जाये तो
हो जाये हर पल उल्लास

- उमेश मौर्य
१ नवंबर २०२०

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter