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         कहीं दीप तुम जला न देना

अमावसी रातें मेरी हैं
कहीं दीप तुम जला न देना
सूना है सूना रहने दो
मन का आँगन बसा न देना

अनजानी है भोर जहाँ से
ऐसा अंधा तिमिर पिया है
शंका संदेहों के क्षण को
हमने सौ सौ बार जिया है
परिचय थका समय के पथ पर
सपनों की तुम बाँह न देना
विस्मृति है विस्मृति रहने दो
वह अभिशापित चाह न देना

गंगा सूखी संकल्पों की
वचनों का गल चुका हिमालय
किसके निष्ठुर संकेतों से
डोला निष्ठा का देवालय
अर्थ हीन भटकी यात्राएँ
दूरी इसकी मिटा न देना
जीवन पतझर है रहने दो
मधु ऋतु कोई दिशा न देना

- रंजना गुप्ता

१ नवंबर २०२०
 

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