अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

         चलो कुछ दीपक बालें

लंबी हों जब तम की रातें
करें रौशनी की कुछ बातें
अनगिन दीप चलो हम बालें

क्यों दिखते हो दुखियारे से
झाँखो मन के गलियारे से
कट जायेंगे तम के बंधन
कहे उजाला अँधियारे से
कुछ खद्योत चलो हम पालें

दुश्वारी से क्या घबराना
छोड़ो खुद से रार निभाना
ढह जाती दीवारें तम की
सीख ज्ञान के दीप जलाना
आज नयी इक राह बना लें

खोल कुहासों का अब ताला
दुविधाओं को जाए टाला
बीता बरस सजी है फिर से
रंगोली और दीपक माला
मंगल गीत चलो हम गालें

त्योहारों का मौसम छाया
रौशनियों ने जश्न मनाया
घर-घर दीप जलाने जैसे
सूरज खुद धरती पर आया
फुलझड़ियाँ मिल आज जला लें

- आभा खरे

१ नवंबर २०२०
 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter