अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


बिकें दिये दीवाली हो

   



 

कुछ माटी के बिकें दिए
दीवाली हो
कुछ अपने भी खिलें हिये
दीवाली हो

डलिया में रखकर ला रहे कपास नई
इसकी बाती देगी धवल उजास नई
उसकी कैसे मने आज दीवाली कह
फूटी दमड़ी जिसके अपने पास नहीं
तेरे भी, मेरे भी लिए
दिवाली हो
कुछ अपने भी खिलें हिये,
दीवाली हो

दीवाली पर घर घुस आती अला बला
बुरी हवा या बुरी नज़र का जोर चला
पत्ते ये शिरीष के बाँधो दरवज्जे
हर अनिष्ट को द्वारे से ही देंय टला
तरह तरह के जतन किये
दीवाली हो
कुछ अपने भी खिलें हिये
दीवाली हो

पान फूल बेचे,कन्दीलें कागज़ की
बाज़ारों पर हावी चीलें कागज़ की
इक छन को ये मन हरियल हो जाएगा
ज़रा झलक मिल जाए नीले कागज़ की
बरसों गम के घूँट पिये
दीवाली हो
कुछ अपने भी खिलें हिये
दीवाली हो

कोरे कुल्हड़ में भरियो बाबूजी खील
भरियो दिल में नयी नयी
खुशियों की झील
तेरी खुशियों में मेरा भी साझा हो
हाट तलक आये हम चलके मीलों मील
यही आस ले रोज़ जिये
दीवाली हो
कुछ अपने भी खिलें हिये
दीवाली हो

- पंकज परिमल
१ अक्तूबर २०१७

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter