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दीप बहारों के

   



 

इतराते हैं कहीँ महल मॆं
दीप बहारों के
अंधकार मॆं कहीँ खो रहे
सदन हजारों के

थके-थके दिन भटक रहे हैं
कुहरे मॆं पागे
दाँव खेलती नियति कलमुँही
रात-रात जागे

झिझक रहा सूरज भी आते
घर लाचारों के

तोड़ रहीं दम यहाँ हवायें
चुप आते-आते
व्यतिक्रम के मारे-से बीतें
दिन रोते गाते

हृदय कँपा जाती है पछुआ
इन बेचारों के

सौदागर ने कैद रखी है
खुशबू झोली मॆं
अर्थ ढूँढती फिरे वेदना
गूँगी बोली मॆं

कैसे पहुँचे नाव किनारे बिन
पतवारों के

- कल्पना मनोरमा
१५ अक्तूबर २०१६
   

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