अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

हुए उत्तरायण रविदेव
 
देवलोक में दिन निकला है
हुए उत्तरायण रविदेव
जन में जगी उमंग फिर

हटने लगे शीत के तम्बू
खुलने लगा धुंध का घेरा
सर्जन की ठिठुरन कम होती
आशा लाया नया सवेरा
कर्म उष्णता से हरषाते
पुनः शक्तियों को कर प्राप्त
निकले टोली संग फिर...

तिल-गुड़ की साझेदारी ने
संबंधों को न्योता भेजा
चूड़ा-दही लगे हैं करने
इच्छा का संतुष्ट कलेजा
आँगन-आँगन का गठबंधन
अभिव्यक्ति व भावों की भेंट
मन बन गया पतंग फिर

- कुमार गौरव अजीतेन्दु
१ जनवरी २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter