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ठिठुर रही संक्रान्ति
 
ठिठुर रही संक्रान्ति एक कंबल दे आना
भूखी बैठी होगी खिचड़ी लेते जाना

पिछवाड़े के नाले पर है उसका टट्टर
पूस माह की रात काँपता घर है थर-थर
बजते होंगे दाँत होंठ भी सूखे होंगे
ठेले वाला एक दुशाला
देते आना

बोल रही थी एक दिन है बेटी का गौना
माँग रही वह पायल-बिछिया नया बिछौना
जब से होश सँभाला घर-घर काम किया है
अब तो उसको देना चहिए
कुछ नज़राना

सच ये है ब्याही बेटी अपनी नहिं होती
दो कुल की मर्यादा रख कंधों पर ढोती
ढोते-ढोते संस्कार से बोझिल मन को
गजक-रेवड़ी देकर के
मीठा करवाना

- जिज्ञासा सिंह
१ जनवरी २०२४

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