अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

रीत प्रीत की

 

रीत प्रीत की बन गई, राखी का त्योहार
हरित रूप ले धरा ने, बदला निज व्यवहार

कच्चे धागों मॆं भरा, भगिनी का विश्वास
कर से कर में बाँधती, अपने मन की आस

बूँद-बूँद से सज गया, सावन का रँग रूप
मदिरालय से छलकते, नदिया पोखर कूप

झरना झर-झर कर रहा, मनहारी झंकार
श्याम सलोने जलद का, मानूँगा उपकार

इन्द्रधनुष पर छा गये, जीवन के सब रंग
हलके-गाढे रंग मॆं, जीने के बहु ढंग

प्रेम और विश्वास मिल, सजती राखी हाथ
विधना ने सुंदर रचा, भाई-बहन का साथ

हुई प्रेमवस बाँवरी, विरही बरखा रैन
रह-रह उर को सालते, चातक पाहन बैन

- कल्पना मनोरमा
१५ अगस्त २०१६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter