अनुपम छवि

 
  अनुपम छवि है रामसिया की
पावन प्रेम कथा दुनिया की

देख राम की छवि उपवन में
मोहित मुग्धा अन्तर्मन में
मधुर प्रेम की सजी रँगोली
जली अहर्निश ज्योति दिया की

थे आसीन धनुर्धर सारे
कर प्रयत्न सब के सब हारे
तोड़ा शिव का धनुष राम ने
पूर्ण कामना हुई प्रिया की

ले जयमाल चली जब सीता
दो पग में जगती को जीता
मिलने को सागर से आतुर
प्रीति अनोखी ज्यों नदिया की

आनंदित सुर मुनि नर नारी
सृष्टि समष्टि सकल बलिहारी
वंदन अभिनन्दन रघुनन्दन
जनक नंदिनी हुई पिया की

- विश्वम्भर शुक्ल
१ अप्रैल २०२४

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