श्रीराम से संवाद

 
  स्वप्न में करती रही
श्रीराम से संवाद

बंद थे ये चक्षु मेरे
मैं हवा में उड़ रही थी
खुल रही थीं खिड़कियाँ
उन खिड़कियों से जुड़ रही थी
राम के ही नाम की रिमझिम
फुहारें आ गिरीं
बूँद की हर एक लय
करती रही आबाद

आत्मविस्मृत भावपूरित
बन गया मन आज नभचर
प्रश्न करता वह हज़ारों
मिल रहा बस एक उत्तर
राम ही जीवन रचयिता
राम ही ब्रह्माण्ड हैं
जन्म में भी राम ही हैं
मृत्यु के भी बाद

राम में रमता रमा मन
है नहीं लौटा अभी तक
इस गगन से उस गगन में
देखती प्राकार भौचक
राम के अनगिनत वर्णी
रूप से विस्मित नयन
हर दिशा में हो रहा
श्रीराम का ही नाद

- जिज्ञासा सिंह
१ अप्रैल २०२४

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