रघुनंदन श्रीराम की

 
  सुनो-सुनो ये सत्य सनातन, बात अयोध्या धाम की
नारी मर्यादा के रक्षक
रघुनंदन श्रीराम की

माता कैकेई ने वर में माँग लिया वनवास
राजपाट तज चले सिया संग ओढ़ लिया सन्यास
जीवन-मूल्य रहें संरक्षित धर्म -ध्वजा का मान
वचन न टूटे मात-पिता का अटल रहे सम्मान
लौट अवध में सर्वप्रथम
कैकई को किये प्रणाम की

गंध-रूप रस- भ्रम के वश में किया इन्द्र ने पाप
छद्मरूप ने नारी जीवन बना दिया अभिशाप
शील-हरण पश्चात अहिल्या हो बैठी पाषाण
निर्मल वचनों की धारा से हुए संचरित प्राण
रूमा, तारा, मंदोदरि को
मिले सुखद परिणाम की

जाति-धर्म से ऊपर उठकर खाए जूठे बेर
सिद्धा कहलाई माँ शबरी वाल्मीकि की टेर
प्रेम अगाध, अनन्य भक्ति से पाया प्रभु का धाम
राम-नाम लेकर तर जाता, जपता जो निष्काम
आदर्शों का पथ दिखलाते
पुरुषोत्तम श्रीराम की

साधारण जन के अबोध का, हुआ तनिक जो भान
प्राणप्रिया सीता को त्यागा बचा राज-सम्मान
पुरुषोत्तम कहलाए जग में, किया लोक- व्यवहार
सरयू में हो गये समाहित, विष्णुरूप अवतार
एकनिष्ठ पत्नी व्रतधारी
अविकारी अभिराम की

- भावना तिवारी
१ अप्रैल २०२४

 

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