जब राम जुड़े मन में

 
  दैहिक तापों से जर्जर हो
संकल्प पिघलने लगते हैं
लेकिन जब राम जुड़े मन में
सब अर्थ बदलने लगते हैं

मैं-मेरा का जब भान छुटे
सब अपने-अपने लगते हैं
अपना समझो, अपना देखो
सब अपने लगने लगते हैं
सच है जब राम जुड़े मन में
सब अर्थ बदलने लगते हैं

अपने-अपने दुख के घेरे
हम अक्सर बंद कर लेते हैं
खुशियाँ साझा कर लेते हैं
दुख चुप चुपकर सह लेते हैं
लेकिन यदि राम जुड़े मन में
सुख-दुख सम लगने लगते हैं

जब कामनाओं के जंगल में
हम सुख-दुख को पाते-खोते
दैविक तापों में घिरकर सब
भव सागर में खाते गोते
तब राम बसे हों यदि मन में
सब ताप सुधरने लगते हैं

- भावना सक्सैना
१ अप्रैल २०२४

 

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