अवध में श्री राम

 
  चैत्र नवमी दोपहर में जन्म प्रभु का था हुआ
मंद शीतल वायु सुख की तब चली देने दुआ

भौंह लंबी नाक सुंदर तुंग उन्नत भाल जो
आँख पंकज-सी मनोहर होंठ उनके लाल जो

दाँत दाड़िम-से दमकते बाँह घुटनों तक बड़ी
वक्ष चौड़ा रूप मनहर दर्श की आयी घड़ी

मेघ नीला रंग उनका बाल काले छवि अदा
खींच अपनी ओर लेता ईश आकर्षण सदा

चाँद तारे जब तलक हैं राम मंदिर है रहे
देश में त्रेता रहेगा स्वर्ग इसको जग कहे

धर्म की जब हानि होती जन्म प्रभु ने है लिया
दुष्ट कुल का नाश करके सत्य जग को है दिया

वंश वैभव सब लुटे थे स्वर्ण अक्षर में लिखे
नीति सच पर वे चले थे राम मर्यादा दिखे

राम का मंदिर बना है, पूर्ण अब जन कामना
ज्योति राघव की जली है सत्व द्युति मन भावना

प्रभु सिया लक्ष्मण अवध में लौट वापस आ गये
स्वर्ग से प्यारी अयोध्या लौट तापस आ गये

फूल माला से सजे सब भव्य आँगन द्वार हैं
जो अलौकिक दिव्य दिखती मेट मन दीवार है

देव देवी का सजा सब ईश का दरबार है
प्रेम की महिमा बताते चित्र छवि संसार है

- डॉ मंजु गुप्ता
१ अप्रैल २०२४

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