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फागुन की मस्त बयार

 

  फागुन की मस्त बयार चले, विरह की
अगन जलाए रे।
हरे वसन के घूँघट से तू सरसों
क्यों मुस्काए रे?

नगर-नगर द्वार-द्वार ग्राम-ग्राम में
अबीर के बादल छाए
प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन
नीर बरसाए रे।

चाँद की शीतल किरनों से शृंगार
किया मैंने अपना
अंसुवन से नयनों का काजल, बार
बार धुल जाए रे।

फगुआ, झूमर और चौताला जब परवान
चढाई जाए
ढोल, मंजीरे और मृदंगा, तुम बिन
जिय धड़काए रे।

बीत न जाए ये फागुन भी, जियरा
तरसे होली खेलन
गीतों की गमक, नृत्यों की धमक, सब
तेरी याद दिलाए रे।

कागा इतना शोर मचाए, लाया है
संदेश पिया का
मधुकर भी मधु-रस पी पी कर, फूलों
पर मंडराए रे।

हरे वसन के घूँघट से सरसों भी
मुख चमकाए रे!!

- महावीर शर्मा

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