अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

                                   सीख रहे हैं

 

सीख रहे हैं,सीख रहे हैं
हम तो अब भी सीख रहे हैं!

पहले से अन्तिम अक्षर तक
जीवन के,
बस,
दाह दे रहे
रेशा-रेशा चुन-चुन कर वे
मधु गीतों के,
राग ले रहे

फिर भी ख़ुश से दीख रहे हैं!
हम तो अब भी सीख रहे हैं !!

शाला हैं
विद्या की दुनिया,
क्रमश: स्तर को
ऊपर करतीं,
ज्ञान-पत्तियाँ टिक पाती हैं
शाख पेड़ पर,
पीली झरतीं

पंथ पुराने
लीक रहे हैं
हम तो अब भी सीख रहे हैं!

- सुभाष वसिष्ठ
१ सितंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter