अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

            खुली पाठशाला

 

नदी ने जल से कहा बहते रहो
रुके तो हो जाओगे मैले
सूख कर मर जाओगे

चाँद तारे धरा और नक्षत्र
जीवित हैं निरंतर चल रहे हैं
हरी भरी दूब सहला रही है
बढ़ते हुए युवा चरणों को

धरती माँ से सीख लो सूखे बीज
को अंकुरित करने की कला
सीख लो कैसे हारे थके जीवन
को नवांकुरित करना है तुम्हें

गुलाबी गंध फैलाने के लिए
पवन जाने कहाँ से आ गई
लगन और विश्वास को
मिल ही जाता है दैवी सहारा
प्यास धरती की बुझाने को
आगए आकाश में बादल
खुले आकाश के नीचे

इस पाठशाला में कोई
प्रत्यक्ष चित्रों से समझा रहा
रचना की उलझी हुई गुत्थी
टीचर एक विद्यार्थी अनेकानेक।

- शिव नारायण जौहरी
१ सितंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter