अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

सोना कर दे लौह को
 

१

सोना करदे लौह को, सही दिखाते राह।
शारद से पहले नमन, गुरु चरणों में चाह।
गुरु चरणों में चाह, भरे मेधा से प्याला।
जड़ता करते नाश, ज्ञान की उत्तम शाला।
कहे 'कुसुम' कर जोड़, बुद्धि का भर लो दोना।
गुरु प्रज्ञा आगार, शुद्ध हो जैसे सोना।

२

पढ़ लो गुण लो सीख लो, दो गुरुवर को मान।
इधर उधर मत ताकना, नहीं मिलेगा मान।
नहीं मिलेगा मान, बोध से होंगे वंचित।
तन्मय होकर सीख, ज्ञान भी होगा संचित।
कहे 'कुसुम' इक बात, धैर्य से आगे बढ़ लो।
जाकर गुरु के पास, कलाएँ सारी पढ़ लो।।

३

शाला जाकर जो करे, शुभ विद्या स्वीकार।
छात्र नहीं वे मानते, जीवन में फिर हार।
जीवन में फिर हार, मान शिक्षक का करते।
मन में रखते धैर्य, ज्ञान से झोली भरते।
'कुसुम' सीख व्यवहार, जगत में करे उजाला।
रहे सफलता साथ, पढ़ें जो जाकर शाला।।


- कुसुम कोठारी प्रज्ञा
१ सितंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter