अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

       सद्भावों की पतंगें

 
सद्भावों की आज पतंगें
कटतीं गली - गली

गयी अवांछित हाथों में है
जब -जब इनकी डोर
खूब प्रपंची पेंच लड़ायें
गद्दी के बरजोर
जिनके हाथों में माँझा था
उनसे गयीं छली

लूट अस्मिता तार -तार धर
अबरी रहे मरोर
ये काटा वो काटाकाटा
करें सिरफरे शोर
ऊँचे कंगूरों से करते
बातें हैं छिछली

रहें समन्वित जन-गण सारे
हो न कहीं टकराव
बातें नभ से करें पतंगें
सहे न कोई घाव
समरसता की पारी खेले
पीढ़ी अब अगली

- अनामिका सिंह अना
१ फरवरी २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter