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     .सूरज रहता दंग

 
आसमान को छूने
निकली आज पतंग

लड़ती है मौसम की खींचातानी से
ऊपर उठती कहाँ कभी आसानी से
जीवटता को देख के
सूरज रहता दंग

हवा-धूप से मिलती है, बतियाती है
हर उड़ते पंछी का साथ निभाती है
जीती आयी है
जीवन में भाव-तरंग

नहीं धरा का रिश्ता कभी भुलाती है
आखिर लौट पुनः घर अपने आती है
रोज बाँटती खुशियाँ
सबको रंग-बिरंग

- योगेन्द्र प्रताप मौर्य
१ जनवरी २०२३

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