अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

     . नभ में उड़ी पतंग

 
नेह प्रीत की डोर बाँध कर
नभ में उड़ी पतंग
ले मन में नयी उमंग

लाँघ दीवारें मोह माया की
जाने किसको ढूँढ रही
नभ गलियों में फिरे बाँवरी
किस उलझन से जूझ रही
जिस योगी से उलझी डोरी
बँध गई उसके संग

छूट गये सब महल चौबारे
छूटा अँगना देहरी
उम्मीदों के पंख पाँव में
हवा ने रुनझुन छेड़ी
धूप किरण की झाँझर बाँधी
पग पग में ताल- तरंग

सरसर सरसर उड़े मानिनी
लहराए पीत चुनरिया
यहीं कहीं तो पी की नगरी
यही वो मीत साँवरिया
द्वार खड़ी सब दिशा दिशाएँ
छिटकें इन्द्रधनु के रंग

- शशि पाधा
१ जनवरी २०२३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter