अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

     .   मन पतंग

 
रंग-बिरंगी मन-पतंग पर
अनुशासन की डोर

ऊपर जाने की लगी लगन
मिला पतंग को वृहद गगन
इधर उधर सपनों-सी डोले
आधेमुँदे नयन में मगन
ठंड गुलाबी मकर रेख पर
आशाओं की भोर

किसको कैसी डोर मिली है
किसको कैसा साथ मिला
अनजानी रह गई पतंग को
किसी से कोई नहीं गिला
पेंच लड़ा खुश हुए खिलाड़ी
उलझ गया है छोर

प्रीत पतंग बसे जीवन में
कौशल रहे उड़ाने का
खुशियाँ रहे तरंगें बनकर
जोश रहे बह जाने का
पर्व लिए आया उमंग को
लेना खूब बटोर

पूँछ सहित मछली ड्रैगन बन
नभ में उड़ती रही पतंग
देख- देख कर आह्लादित हैं
धरती पर के मस्त मलंग
संस्कारों के धागे लिपटे
जीवन में चहुँ ओर

– ऋता शेखर ‘मधु’
१ जनवरी २०२३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter