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     . उड़ी पतंगों जैसी

 
उड़ी पतंगों जैसी उनकी
बारूदी इच्छाएँ!
रूह कँपाती घूम रही हैं
ज्ञान भरी शिक्षाएँ!!

गैरजरूरी मुद्दे पर जब
होती बहस सफल है
प्रायश्चित करने वालों की
लगती नई पहल है
सरकारी पूँजी डकारकर
ऐश किये हैं जिनने
इसी शहर के गलियारों में
उनके कई महल हैं
दसों दिशाओं में फैली हैं
उनकी अभिलाषाएँ!!

घोटालों के रंग में रंग गये
अखबारों के पन्ने
एक तमाशा यहां देखिये
होकर के चौकन्ने
विज्ञापन पर देख खुशी से
भरने लगे तिजोरी
बेशकीमती पेय पी रहे
चूस रहे हैं गन्ने
स्नेह और सम्मान सहित
हैं अगणित सुविधाएँ!!

मीठे हैं अंगूर यहाँ पर
होता है आभास
स्वारथ के कंधे पर चढ़कर
अपनों का उपहास
लोकतंत्र की मीठी लीची
सबके मन भाती है
खेल निराला सदा समय का
कर लो तुम विश्वास
जीवन के आपाधापी में
हैं हर पल दुविधाएँ!!

- श्रीधर आचार्य "शील"
१ जनवरी २०२३

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