अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

    साहस भरी पतंग

 
आशाओं की डोर पर, भर सपनों में रंग
आसमान छूती रही, साहस भरी पतंग

सारे संशय भूलकर, जो बढ़ता है झूम
वह पतंग सा अन्ततः, नभ को लेता चूम

कोई भी आकार हो, कोई भी हो रंग
उचित युक्ति को साधकर, पाती लक्ष्य पतंग

कभी शिथिलता सुखभरी, झेले कभी तनाव
जीवन के इस द्वंद में, हो पतंग सा चाव

कब बदलेगी रुख हवा, किसको यह पहचान
जब तक सब अनुकूल है, रच पतंग प्रतिमान

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
१ जनवरी २०२३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter