अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

      उड़ी पतंगें

 
चादर सरसों की इधर, उधर पतंगें डोर
शीत ऋतु ने छू लिया, भू-नभ का हर छोर

नीली, पीली, लाल सब, उड़ी पतंगें-पाट
रंगों का मेला लगा, आसमान घर-घाट

कैसे लेती है निभा, सब संबंध पतंग
चरखी-हाथों डोर औ', उड़े हवा के संग

किसका माँझा कब यहाँ, काट गिराए अंग
सँभल-सँभल मिलना गले, कहती यही पतंग

कागज जैसी देह में, समझ अस्थियाँ बाँस
जीवन अगर पतंग तो, डोरी इसमें साँस

- परमजीत कौर 'रीत'
१ जनवरी २०२३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter