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ऋतुपंछी ने सोहर गाई
 
देखो साधो
समय-बिरछ पर
नई धूप-कोंपल उग आई

पिछले दिन सब बुढ़ा गये थे
अंतिम दिन भी झड़ा रात कल
टेर रही है नई छाँव को
देखो, यह नवजाई कोंपल

इतने दिन चुप रहा
आज फिर
ऋतुपंछी ने सोहर गाई

आज सुबह से चली हवा जो
घुप सोनल है - मिठबोली है
साधू ने भी बड़े घाट के
मंदिर की खिड़की खोली है

धुंध-कुहासे छँटे
सो-रहे सूरज ने
फिर ली अँगड़ाई

पगडंडी पर बिछी ओस भी
हुई अचानक सोनबरन है
साँसों की आवाजाही में
नेहभरा इक अपनापन है

परबत के उस पार
झील पर
कहीं बज रही है शहनाई

- कुमार रवीन्द्र
२९ दिसंबर २०१४

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