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         नव पल्लव नव भोर

 
नव पल्लव नव भोर खिलेगी
गान विहग नव
तब गाएँगे

रंग निशा का भी गहरा था
अलकों पर भी इक पहरा था
सूर्य किरण में वो चमकेंगे
नर्तन करते सपन सजेंगे
चले गए जो पल अलबेले
भीग रहे हैं नयन लजीले
धीर धरो सब समझायेंगे
वापस इक दिन
सब आएँगे

शीत बयार रही भटकाये
ताप हृदय का मन दहकाये
सृजन गान तब नवल करेंगे
विहग उड़ान नभ में भरेंगे
तिमिर घना हो चाहे कितना
कंटक चुभते चाहे जितना
तरु पर नव पल्लव आएंगे
सृजन सतत है
बतलायेंगे

- निवेदिता निवि
१ जनवरी २०२२

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