अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        आए साल नवल

 

पूरब वाले दर से आना
नई छटा बिखराते छाना
हम उम्मीदों भर जागे हैं!!

अबतक चर्चा उगे खार की
भिंची मुट्ठियों उठे ज्वार की…
निर्जल घाट व्यथा गुहराएँ
'नदिया लाना बहे धार की!
अच्छे दिन अब
देखें आँखें
हाथ छुड़ा सपने भागे हैं
हम उम्मीदों भर जागे हैं!!

बहुत हुआ जो रात घनी है
कुहा-ठंड में खूब बनी है
उलझी-सी आँखों में अबतक
बिखरी-बिखरी बर्फ कनी है
तार-तार है अपनी लोई
सधे हाथ से
आ, सुलझाओ !
देखो ना उलझे धागे हैं!
हम उम्मीदों भर जागे हैं!!

- सौरभ पांडे
१ जनवरी २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter