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अबकी सबकुछ
 
अबकी सचमुच
नया साल कुछ नया रहेगा
ऐसा लगता है

कथनी करनी जीभ चिढ़ाती
लड़ती भिड़ती ही देखीं थीं
अब तक हमने
रीढ़ बिना ही डगमग चलती
गिरती पड़ती ही देखीं थीं
अब तक हमने

किंतु चाल इस बार
ज़रा बदली लगती है
जो बोलेगा वही करेगा
ऐसा लगता है

डरा डरा सा कल का चेहरा
ज़रा ज़रा सा बदला बदला
सा दिखता है
‘शायद’ का घनघोर कुहासा
छँटता, सब कुछ उजला-उजला
सा दिखता है

रंग ढंग सब नए निराले
से दिखते हैं
नए नए दृष्टांत रचेगा
ऐसा लगता है

आवारा आधारहीन सी
आशा को आधार स्यात् इस
बरस मिलेगा
बंजारा सोचों के पाँवों
को भी कोई द्वार स्यात् इस
बरस मिलेगा

स्वस्ति कामनाओं में चंदन
महक रहा है
शुभ का हर इक वचन फलेगा
ऐसा लगता है

- सीमा अग्रवाल    
१ जनवरी २०१८

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