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देखे रहना
 
 
नये साल को
रोग पुराना लग ना पाये
देखे रहना

फर्क़ समझना
सच्ची सौं
कोरी लफ्फाजी में
मत उलझाना
मन को अपने
काबा, काशी में

भाईचारा
फिर अफवाहों में ना आये
देखे रहना

अम्मा दीदी
भैया जी नेता जी
बहिनी का
लेखा जोखा रखना
सबकी
कथनी-करनी का

चाय चाय में
कोई जुमला ठग ना जाये
देखे रहना

पार उतरना
अपनी करनी
मत औरों की राह निरखना
दीठ लगे ना
माथ देश के
सत्कर्मों का टीका रखना

अधिकारों की चाह
न अब कर्तव्य भुलाये
देखे रहना

भाव
परायेपन अपनेपन का तज
न्याय करे निरछल हो
जनगण के नायक को
जनगण हो वरीय पहले
फिर दल हो

कहीं न अलगू ही
जुम्मन के दोष छिपाये
देखे रहना।

- कृष्ण नन्दन मौर्य
१ जनवरी २०१८

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