अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

सुनो डाकिये
 
 
नए साल के सुनो डाकिये !
चिट्ठी लेकर आना
भूले बिसरे सपनों के
अधरों पर गीत सजाना

अभी खड़ी है
रात अंधेरी देह दिवस की काली
मटमैली है आँख साँझ की
पाँव लगी ना लाली

सुर को काँधे पर लादे
आलाप भोर का गाना

पिछले बरस भी
तुमने अच्छे दिन की बात कही थी
हर दोपहरी भरी पसीने
तकती राह रही थी

आस का अब विश्वास न टूटे
छड़ी परी की लाना

अभी प्रेम की
नींद खुली कब लेता है खर्राटे
हर आँगन के कान हैं बहरे
खड़ा देहरी बाँटे

दम साधे दीवारों को है
ग़ज़ल मीर की पाना

- गीता पंडित  
१ जनवरी २०१८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter