अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 गीत गाएँ
 
 
हैप्पी नू यर क्या है
चुनिया पूछ रही दउआ से

दउआ कहते क्या मालुम री
बड़े जनों के, बड़े चोचले
ऊपर-ऊपर ब्रांडिड दिखते,
भीतर-भीतर जियें खोखले।
मुड़ी खुपड़िया
लिये टाहपते
छले गए गउआ-से

हमें दाल-रोटी की चाहत
नहीं चाहते पूरी-भुर्ज़ी
तन को इक छन्ना मिल जाये
बस अपनी छोटी-सी अर्ज़ी
कंडे थाप रही
मजबूरी
दिवस लगें हउआ-से।

महरारुन की बदली चालें
रंग-ढँग पुरुषन के
नये बरस में हमें मिलेंगे
कुछ कपड़े उतरन के
पड़ा मिलेगा
कहीं सिपहिया
लड़-भिड़ कर पउआ-से

- भावना तिवारी  
१ जनवरी २०१८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter