अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

ब्रज की माटी
     

 





 

 


 




 

ब्रज की माटी में जन्मे और खेले जसुदा के नन्दन
ऐसी माँटी को करता नित, बार-बार मैं अभिन्दन

ये ही माटी छुप-छुप खाई, गोपी चीर चुरइया ने
यहीं सुनाई धुन मुरली की, बलदाऊ के भइया ने
यहीं मिले धे त्रिपुरारी को, बालरूप में ब्रजनन्दन

श्री राधा के साथ यहीं पर, रास रचाया बनवारी
होरी खेली गोपिन के संग, भरि-भरि रंग की पिचकारी
यहीं किया संहार कंस का, यहीं कालिया का मर्दन

यहीं द्वारिकाधीश बिराजें, गोवर्धन महाराज यहीं
गोकुल और बरसाना प्यारा, नन्दगाँव की छटा यहीं
यही बिहारी जी भी काटें, सभी दुःखों के नित बन्धन

मधुर कंठ से गाये जाते, यहाँ रसखान सवैया भी
सूरदास ने पद गाये थे, नाचे कृष्ण- कन्हैया भी
कालिन्दी के तीर कदम्ब भी, महकें जैसे चन्दन

--सन्तोष कुमार सिंह
३० अगस्त २०१०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter