अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

सौरभ पाण्डेय की मुकरियाँ

 


आना-जाना, होना तय है
फिर भी मनमाना अभिनय है
कर दे सुखमन या फिर बेदम
का सखि साजन? ना सखि मौसम

साथ न हो तो मन में छटपट
संग न नटखट तो सब अटपट
रंग-रूप-गुण पर मैं काइल
का सखि साजन? ना मोबाइल

खुश रखता है मन को भाता
एक अलग संसार सजाता
मुझे समझ उसकी परजीवी
का सखि साजन? ना वह टीवी

ताड़े तौले औ’ तड़पाये
मीठी बातों से भरमाये
मन की कह खुद कान न देता
का सखि साजन? ना सखि नेता

हुआ अँधेरा आता झटपट
छिपना चाहे सुनते आहट
दिखते ही सिहरा दे जट्टा
का सखि साजन? ना तिलचट्टा

दिन ढलते वह चूमे-चाटे
तन सिहरा दे, चिकुटी काटे
छेड़े और सताये खुल कर
का सखी साजन? ना सखि मच्छर

- सौरभ पाण्डेय
१ अगस्त २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter