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संजीव वर्मा सलिल की मुकरियाँ

 


वस्त्र सफेद पहनतीं हरदम
नयनों में ममता होती नम
अधरों पर मुस्कान सजाएँ
माँ? नहिं शारदा
आ गुण गाएँ


रहे प्रतीक्षा इसकी सबको
कौन न चाहे कहिए इसको
इस पर आए सबको प्यार
सखि दिलदार?
नहिं रविवार


काया छोटी; अर्थ बड़े
लगता रच दें खड़ेखड़े
मोह न छूटे जैसे नग का
वैसे नथ का?
ना सखि क्षणिका


बिंदु बिंदु संसार बना दे
रेखा खींचे भाव नया दे
हो अंदाज न उसकी मति का
सखी शिक्षिका?,
नहीं अस्मिता


साथ बहारें उसके आएँ
मन करता है गीत सुनाएँ
साथ उसी के समय बिताएँ
प्यारी कंत?,
नहीं बसंत


कभी न रीते उसका कोष
कोई न देता उसको दोष
रहता दूर हमेशा रोष
भैया होश?,
ना संतोष


समझ न आए उसकी माया
पीछा कोई छुड़ा न पाया
संगसाथ उसका मन भाया
मीता काया?,
ना रे छाया


कभी न करती मिली रंज री
रहती मौन न करे तंज री
एक बचाकर कई बनाए
सखी अंजुरी?,
नहीं मंजुरी

- संजीव वर्मा सलिल
१ अगस्त २०२६

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