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प्रगति शंकर की मुकरियाँ

 


गुण उसके है बड़े अनमोल
सेहतमंद वह गोल-मटोल
सुघड़ सरस, नहिं तनिक साँवला
क्या सखि साजन? नहीं आँवला


डंडे जैसी लंबाई है
बड़ी मधुरता पर पाई है
लगता ज्यों हरियाला बन्ना
क्या सखि साजन? नहिं सखि गन्ना


ताल तलैया उसको भाए
काला कोट पहन कर आए
सरल हृदय, नहिं कभी दहाड़े
क्या सखि साजन? नहिं सिंघाड़े


उससे नजरें मोड़ न पाती
सम्मोहन मै तोड़ न पाती
उसके बिन हर बात अधूरी
सखि साजन? नहि पानीपूरी


गुण है उसके बड़े अनमोल
सदा मधुरता देता घोल
चेहरे पर ले आए नूर
क्या सखी साजन? नही खज़ूर
प्रगति शंकर की मुकरियाँ


आफत बन कर सब पर छाए
बच्चे दुबके नजर न आए
सभी बने है उसका मुहरा
का सखि साजन? ना सखि कुहरा


सम्मोहन उसका भरमाए
डूबे जो वह उबर न पाए
ज्यों दलदल की गहरी झील
क्या सखि साजन? नहि सखी रील


उस के बिन लगती लाचारी
उस से ही मुस्कान हमारी
उज्जवल ज्यों मोती की पाँत
क्या सखि साजन?,नहीं सखि दाँत

- प्रगति शंकर
१ अगस्त २०२६

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