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निशा कोठारी की मुकरियाँ

 


पोर उँगलियों के सहलाये
अधरों के कम्पन भी पाये
श्वासों से ले सरस माधुरी
का सखि साजन? नहीं बाँसुरी


तरह तरह के उसके रंग
प्रेम प्रदर्शन उसके संग
बढ़ जाती आँखों की आब
क्या सखि साजन? नहीं गुलाब


टिका हुआ है उस पर जीवन
वही सम्भाले रखता है मन
छोड़ न उसे है ये ताकीद
क्या सखि साजन? नहीं उम्मीद


उसे देख कट जाता है दिन
लगे अधूरा घर उसके बिन
दूर करे मन का सूनापन
क्या सखि साजन?न टेलीविज़न


उसके बिना जिया घबराये
रोम रोम मानो जल जाये
उससे ही मिलता है चैन
क्या सखि साजन? नहीं सखि फैन


उसके बिन शृंगार अधूरा
वो नारी को करता पूरा
उसके बिन मुश्किल है जीना
क्या सखि साजन? नहि आईना


मुझे हमेशा ही बहलाता
उसमें मेरा मन रम जाता
मेरी उसकी गहरी प्रीत
क्या सखि साजन? नहिं सखि गीत


कभी रिझाये कभी खिजाये
पल पल रंग बदलता जाये
कभी तपे तो कभी झमाझम
क्या सखि साजन? ना सखि मौसम

- निशा कोठारी
१ अगस्त २०२६

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