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मंजु सक्सेना की मुकरियाँ

 


जब टकराबै कुछ कह जावै
हिलमिल सबसे शोर मचावै
करता कैसे–कैसे नर्तन
क्या सखी साजन? ना सखी बर्तन


सब रहते तो खुश लगता है
कितने अनुभव वह सहता है
किसी से न होती है अनबन
क्या सखी साजन? ना सखी आँगन


नयनों में जब वह भर जाता
नयन दुल्हन का है मुस्काता
दर्पण देखे आँखे मल –मल
क्या सखी साजन? ना सखी काजल


जब भी आवै घर महकावै
मनवा मेरा बहुत लुभावै
उसका है ना कोई जवाब
क्या सखी साजन? नहीं गुलाब


जब आवै तब छू कर जावै
चूम चूम कर बदन सुजावै
दिन ढलते ही आता अक्सर
का सखी साजन? ना सखी मच्छर

- मंजू सक्सेना
१ अगस्त २०२६

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