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लक्ष्मीनारायण गुप्त की मुकरियाँ

 


द्वार बजा उठ सांकर खोली
बैरी ने घुस सेज उकेली
खिंचता चीर हाथ से रोका
थे सखि साजन? ना वत झोंका


चढ़कर छत पर इकटक ताके
नहीं हाँकने से वह भागे
मन बहलाता, गाना गा-गा
क्या सखि प्रेमी? न सखि कागा


रात न आती वह आ जाता
आँगन में उजियारा लाता
जग कर रात निकाले बंदा
क्या सखि साजन? न सखि चन्दा


घर भर की रखवाली करता
रात साथ में मेरे सोता
दिन में दूर रहे अलबत्ता
क्या सखि साजन? न सखि कुत्ता


उस छत से आई इस छत पर
दीवारों को लाँघ फाँद कर
उसका सुंदर कंचन रूप
कौन पड़ोसन? नहीं रे धूप

- लक्ष्मीनारायण गुप्त
१ अगस्त २०२६

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