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कामिनी श्रीवास्तव कीर्ति की मुकरियाँ

 


मन मंदिर में पूजा करती
सुख-दुख अपने उससे कहती
मुझको लगता सदा महान
क्या सखि साजन? नहिं भगवान


जब से उसको है अपनाया
मन को मेरे हरदम भाया
रहती हृद में उसकी चाहत
क्या सखि साजन?ना सखि आदत


उसके बिन हृद चैन न आए
हरदम उसकी याद सताए
सुख सपनों की है वह थाती
क्या सखि साजन?ना सखि पाती


उससे प्यारा लगे न कोई
दूर हुआ जब तब-तब रोई
जाने उससे रिश्ता कैसा
क्या सखि साजन?ना सखि पैसा


चलता हरदम साथ हमारे
हम भी उस पर दिल हैं हारे
रूप रंग बदले वह नाना
क्या सखि साजन? नहीं जमाना


रहे साथ तो ज्ञान बताए
समझ बूझ वह सदा बढ़ाए
रूप लगे उसका मनमोहक
क्या सखि साजन?ना सखि पुस्तक


आँखों में मेरे बसता है
संग हमारे वह हँसता है
अंग लगे तो करता पागल
क्या सखि साजन? न सखि काजल


निशा रहे तब ही घर आए
जब आए तब काम बढ़ाए
लगता मुझको बड़ा निराला
का सखि साजन? नहीं उजाला


कुछ लेना हो तो ही आए
पूँछ-पूँछ के हमें सताए
खुशियों का बनता संवाहक
क्या सखि साजन? ना सखि ग्राहक

१०
पास रहे तो प्यास बुझाए
नहीं मिले तो है तड़पाए
उस पर बनती बड़ी कहानी
क्या सखि साजन? ना सखि पानी

- कामिनी श्रीवास्तव 'कीर्ति'
१ अगस्त २०२६

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