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ज्योतिर्मयी पंत की मुकरियाँ

 


तन मन से नित करूँ सम्मान
वह है आन बान और शान
स्वाभिमान की बहती गंगा
क्या सखि साजन ? नहीं तिरंगा


रोज शाम वह मिलने आए
अक्सर रूप बदल कर आए
छत खिड़की डाली को फाँद
क्या सखि साजन ? नहीं सखि चाँद


रोज सुबह मैं उससे मिलती
हाथ बढ़ाकर उसे चूमती
मिले ताजगी मन मुस्काय
क्या सखी साजन ?नहीं री चाय


उसके बिन अब जीना मुश्किल
हरदम साथ चाहता है दिल
मन उदास खो देता स्माइल
क्या सखि साजन? नहिं मोबाइल


सारे शक संदेह मिटा दे
ज्ञान उजास हृदय मे ला दे
हर मुश्किल पल में कर दे हल
क्या सखि साजन ? नहिं री "गूगल"


साँझ पड़ें वह घर में आता
लुक छिप कर वह मुझे सताता
कभी गुनगुनाए वो अक्सर
क्या सखि साजन ? नहिं री मच्छर


रोज सुबह वह मुझे जगाए
नर्म करों से मुख सहलाए
आलस कर देता छूमंतर
को सखि साजन? नहिं वह दिनकर


सीटी बजा बुलाए मुझ को
पाक कला सिखलाए मुझ को
दौड़ भाग के मिलती अक्सर
क्या सखि साजन? न "प्रेशर कुकर"


ढोल मृदंग बजाते आए
बिजली से महफ़िल चमकाए
खुशियों की लाता सौगात
क्या सखि साजन ? मेघ बरसात

१०
कहीं निगाहें कहीं निशाना
कहने का है अजब दिवाना
मोहक विधा बात कर गहरी
क्या सखि साजन? वो कहमुकरी

- ज्योतिर्मयी पंत
१ अगस्त २०२६

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