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ज्ञानवती दीक्षित की मुकरियाँ

 


मुझको वह प्राणों से प्यारा
दिखलाता रंगीन नजारा
कौन भला उसके समकक्ष
क्या सखि साजन? ना सखि ‘वृक्ष’

वो मेरा जाना पहचाना
मौसम उससे रहे सुहाना
मैं चाहूँ वह रहे समक्ष
क्या सखि साजन? ना सखि ‘वृक्ष’

मुझको लगे वही भगवान
मैं तो उस पर हूँ कुर्बान
उसके दुश्मन कुछ कमबख्त
क्या सखि साजन? नहीं ‘दरख्त’

सारी रात मचाये शोर,
मन करता हो कभी न भोर,
लगे अमावस भी मतवाली,
क्या सखि साजन?
नहीं 'दिवाली'

बदन इकहरा है संगीन,
है स्वभाव से वह रंगीन,
उसके संग रहें शुभ घड़ियाँ,
क्या सखि साजन?
ना 'फुलझड़ियाँ'

- हरिओम श्रीवास्तव
१ अगस्त २०२६

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