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ज्ञानवती दीक्षित की मुकरियाँ

 


बिन कारण वह गुस्सा खाए
पल में रोवे, पल मुस्काए
काम करावे दिन और रात
ऐ सखि साजन? ना सखि सास


तन का लंबा, मन का सीधा
सुर में बोले, हर ले पीड़ा
तान सुनावे लेकर साँस
क्यों सखि साजन? ना सखि बाँस


रात में आवे, कान में गावै
रक्त चूसकर मुख सुजवावै
फिर भी चैन न, एको अच्छर
क्यों सखि साजन, न सखि मच्छर


मुख में जाते रस बरसावे,
फीकी चाय में जान ले आवे
ज्यादा हो तो, रोग बढ़ावै,
क्यों सखि साजन? ना सखि शक्कर

कागज पर अपना रूप दिखावै
अज्ञानी को ज्ञान सिखावै
मिटै न मिटाए शब्द का चक्कर
क्यों सखि साजन? ना सखि अक्षर

- ज्ञानवती दीक्षित
१ अगस्त २०२६

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