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अशोक रक्ताले फणीन्द्र की मुकरियाँ

 


हिम्मत देता हार न माने
खरा टंच वह सोलह आने
सबके लब पर उसकी बतिया
क्या सखि साजन ? ना सखि रुपिया

लम्बी-लम्बी श्वासें खींचे
ध्यान करूँ जब आँखे मींचे
हरदम रहती उसकी धाक।
ऐ सखि साजन ? ना सखी नाक

ऊपर नीचे करता जाये
मेरे उर आनंद समाए
याद दिलाए मौसम भूला
क्या सखि साजन? ना सखि झूला

उसका साथ लगे है प्यारा
घूमूँ उसके सँग आवारा
राह-राह पर पल-पल हरपल
क्या सखि साजन? ना सखि चप्पल
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चैन मिला है उसको पाकर
उस पर सपने सब न्यौछावर
सब कुछ उसके सम्मुख धत्ता
ऐ सखि साजन ? ना सखि सत्ता

- अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
१ अगस्त २०२६

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