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       तीन कुंडलिया

 


रंग बेरंग
ऐसे ही जारी रहा, 'शीत युद्ध' यदि और
फागुन और बसंत को, कहाँ मिलेगा ठौर
कहाँ मिलेगा ठौर, न होगी सरस ठिठोली
रंग होंगे बेरंग, जमेगी कैसे होली?
मनुज हुआ असहाय, शीत को रोके कैसे
थम जायेगी मित्र, सहज दिनचर्या ऐसे


बौराया मन
बौराया मन आजकल, चिंतित और उदास
सूरज कुहरे से घिरा, लाया नहीं उजास
लाया नहीं उजास, दोपहर होने आई
कब तक हो विश्राम, निरर्थक ओढ़ रजाई ?
किया नहीं कुछ काम, दिवस को व्यर्थ बिताया
पड़े-पड़े बेकार, आजकल मन बौराया


अंधकार के दूत
अपकर्मी, दुष्कृत्य के, हैं भण्डार अकूत
भूत, प्रेत, निशिचर सदा, अन्धकार के दूत
अन्धकार के दूत, भरे घट पापों वाले
मुख से उगलें आग, हृदय से होते काले
अँधियारे की राह, तका करते बेशर्मी
उजियारे से नित्य, छुपाते मुँह अपकर्मी

- प्रो. विश्वम्भर शुक्ल
१ फरवरी २०२६

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