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       तीन कुंडलिया

 

१.
छोटी छोटी बात
छोटी छोटी बात भी, बनतीं जीवन-सार
छोटी छोटी राशि से, लगते ढेर अपार
लगते ढेर अपार, धूलिकण भूधर बनते
छूने नभ लघु बीज, जटिल बरगद बन तनते
'ठकुरेला' कविराय, सही जब पड़ती गोटी
बन जातीं इतिहास, चाल भी छोटी छोटी

२.
जीवन रेल
उलझा क्या, क्या है सरल, यह सब मन का खेल
दृढ़ विचार की शक्ति से, चलती जीवन-रेल
चलती जीवन-रेल, जबकि उल्लास भरा हो
मिलनी ही है हार, अगर मन मरा मरा हो
'ठकुरेला' कविराय, यत्न से सब कुछ सुलझा
जिनका मन जीवंत, सुलझ जाता सब उलझा

३.
सपने
नाना दुख, नश्वर जगत, सब डस लेगा काल
पर इस जीवनकाल में, तू कुछ सपने पाल
तू कुछ सपने पाल, उन्हें सच कर दिखलाना
लेकर दृढ़ संकल्प, सहज जीवन-फल पाना
'ठकुरेला' कविराय, जिन्होंने निज बल जाना
वे पाते गंतव्य, भले हों अड़चन नाना

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
१ फरवरी २०२६

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