अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

       तीन कुंडलिया

 

१.
गाँव-घर
पत्थर माटी गाँव घर, चले गए सब छोड़
कच्ची दीवारें बची, पक्का नाता तोड़
पक्का नाता तोड़, पीर किससे अब कहते
वर्षा-गर्मी शीत, चोट को सहते-सहते
भौतिकता की होड़, महत्वाकांक्षा तत्पर
बिखरा है आधार, हृदय पर रखकर पत्थर

२.
मतदान
नर-नारी नेता चुनें, सोच-समझ पहचान
राष्ट्र-धर्म अपना यही, महापर्व मतदान
महापर्व मतदान, निभाएँ जिम्मेदारी
है अमूल्य हर वोट, सुनो मत के अधिकारी
करें सफल अभियान, हुई पूरी तैयारी
खुली आँख से देख, फैसला लें नर-नारी

३.
नदी
झरना बन आषाढ़ में, मन में गूँजे नाद
नदी उमड़ती व्यग्र हो, ज्यों करती संवाद
ज्यों करती संवाद, नयन चंचल कजरारे
गूँजित कजरी गीत, बरसते बदरा कारे
व्याकुल बंधन तोड़, मुक्त हो मन का बहना
लिए प्रीति की आस, विकल हो बहता झरना

- सुधा त्रिपाठी
१ फरवरी २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter