अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

       तीन कुंडलिया

 


शिशिर ऋतु
जाती रितु हेमन्त ने, दिया शिशिर को न्योत
अलसायी है प्रकृति, जगा चेतना ज्योत
जगा चेतना ज्योत, फसल को यौवन देना
होवें सभी निरोग, दे तिल- गुड़ और छेना
'सुधा' धुन्ध हर रोज़, यही सन्देश सुनाती
बड़ी मनचली ठण्ड, बेखटक‌ आती - जाती


दिवाली
बोला गर्वित दीप मैं, धरती का रजनीश
अधलेटी बाती हँसे, रख कंधे पर शीश
रख कंधे पर शीश, अगन से प्रीत लगाए
चुकती जाए उम्र, मगर बाती मुस्काए
बिन मोती ज्यों रिक्त, सीप का रहता चोला
त्यों बिन बाती व्यर्थ, दीप गर्वित बड़बोला


वृद्ध दिवस
बच्चे जैसे जब लगें, वृद्ध पिता के ढंग
अभिभावक बन जाइए, दो पल रहिए संग
दो पल रहिए संग, दीजिए उन्हें महत्ता
बोलें मीठे बोल, करें चिन्ता अलबत्ता
वृद्ध रहें सानन्द, साथ दें दिल से सच्चे
रखिए उनका ध्यान, समझकर नन्हे बच्चे

- सुधा राठौर
१ फरवरी २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter