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       तीन कुंडलिया

 


हाथी
हाथी आया देखकर, बच्चे भाव विभोर
बजा-बजा कर तालियाँ, लगे मचाने शोर
लगे मचाने शोर, देख कर भीषण काया
चींटी से डर जाय, अहो ये कैसी माया
कहे 'शील'कविराय, मगर है सच्चा साथी
जंगल के ही साथ, बचाना हमको हाथी

गंगा स्नान
मिट जाते हैं पाप सब, करके गंगा-स्नान
ये सब कहता मैं नहीं, कहते वेद-पुराण
कहते वेद-पुराण, बात पर समझ न आये
धोने अपने पाप, भला क्यों गंगा जाये
कहे 'शील' कविराय, पाप जो कभी न करते
गंगा में बिन स्नान, पाप सारे मिट जाते

घन सावन
मन तड़पाते ही रहे, ओ मेरे मनमीत
घन सावन के बावरे, खूब निभाई प्रीत
खूब निभाई प्रीत, रहे तुम कहाँ भटकते
पथरायी है आँख, तुम्हें बस तकते-तकते
कहे 'शील' कविराय, बढ़ी है दिल की धड़कन
बरसाओ अब नीर, करो ये शीतल तन मन

- श्रीधर आचार्य 'शील'
१ फरवरी २०२६

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