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       माँ- तीन भाव भंगिमाएँ

 

माता सा होता नहीं, दूजा कोई साथ
सुनो ईश ने ही चुना, सबके सर यह हाथ
सबके सर यह हाथ, कभी विपदा जो आये
वहाँ ढाल बन मात, स्वयं उससे लड़ जाये
कहते वेद पुराण, यह ऋण न चुकने पाता
प्रभु का है आशीष, जगत में संग हो माता

कोशिश करके देख लो, कर लो जतन हज़ार
चुका सके कोई नही, माता का उपकार
माता का उपकार, है सौगात यह ऐसी
सब सौगातें साथ, न कोई माता जैसी
कहते यह कविराय, स्पर्श में ऐसी जुंबिश
बिसरोगे हर दर्द, देख लो करके कोशिश

जब तक यह सौगात है, रह लो जी भर साथ
ना जाने कब रूठकर, ईश हटा लें हाथ
ईश हटा ले हाथ, न सौ सौ आँसू रोना
यह अवसर उपहार, इसे हरगिज ना खोना
कहते ज्ञानी संत, सभी से पावन यह तप
पाओगे तुम स्वर्ग, करो सेवा माँ की जब

- सरस दरबारी
१ फरवरी २०२६

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